tag:blogger.com,1999:blog-14743488.post-1124646321645663542005-08-21T11:42:00.000-06:002005-08-22T06:43:40.466-06:00हे सघन जल मेघ<br />बरसो उमड कर, कोश कर दो शेष<br />रिक्तियों के अन्त तक के गर्भ मे तुमको है जाना<br />यह धरा प्यासी युगों से, लौह इसके अंग मे अब बस गया है<br />एक मरुथल की सी छवि का कोई शर आकर ह्र्दय मे धंस गया है<br />पत्तियों पर शुष्क बून्दे निर्वसन सी नाचती है<br />ज्यों कपोलो पर धरा के अश्रु से झर के गिरे थे<br />उस महोदधि से ही तो तुम लाये हो पानी<br />जिस मदोन्मत कोश को पृथ्वी ने त्यागा<br />बांध दी सीमायें उसकी, उस कथित पौरुष की<br />जिसने जकड कर रखा था युग से, कल्प से<br />और अब भी कर चुकाया कर रहा वह महासागर<br />हे पयोधर तुम उसी जलनिधि के निकटतम दूत ही तो<br />क्या सन्देशे भेजता वह मानिनी प्रथ्वी को निवेदित?<br />दिनोदिन चढता ज्वार के आने के दिन तक<br />और फिर अस्ताचल को जैसे सूर्य हो जाते पराभूत<br />वैसे ही लाघव को, पूरा स्‍वयम्‌ ही करता पयोनिधि<br />देह छू उस यौवना की लौट जाता गेह मे निज चिर वियोगी<br />हे वारिवाहन आये क्या तुम फिर वही आशाओं का दीपक जलाने<br />रश्मियों को रोक कर सूरज की क्या निपट एकान्त तुमको चाहिये?<br />बूंद के आघात से करते क्या निवेदन, इस निपट भोली धरित्री से दिवसनिशि?<br />थामकर बैठा है सागर देखता सा पंथ तेरा उस समय से<br />जब कि तेरे पितृ पूर्वज जन्म भी पाये न थे/<br />और अब भी सामने उसके वही दुर्दम्य सा सागर उच्‍छ्रंखल<br />बद्ध जिस के उर्मिलों मे चिर प्रतीक्षा बून्द के लघुतम कणों सी<br />हे जलद तुम बरस कर कब तक कहोगे ये सन्देशे मौन के<br />कब तक लिखेगा यह वियोगी भाव मन के?<br />और पढवाती रहेगी धरा उनको अपने वृक्ष गुल्मों और त्रण से//Bhaskar Lakshakarhttp://www.blogger.com/profile/18112544818203939650noreply@blogger.com