tag:blogger.com,1999:blog-14743488.post-1122202269284219372005-07-24T04:46:00.000-06:002005-07-24T04:51:09.286-06:00धूप मेरी आंखों मे उतर आयी है,<br />और मै खडा हो गया जाकर उस अकेली बह रही धारा किनारे<br />शिरो बिन्दु तक सब आप्लावित् कर रहा मेरा ह्रदय उस शिशु सद्रश<br />सम्मुख विजय की द्रष्टियां नूतन ह्र्दय नव स्रष्टियां<br />लौकिक नही कुछ भी यहां इस सिन्धु में<br />एक दीपक जला करता है निरंतर उस मनो आलिन्द में<br />वो कूकती रहती है कोकिल स्वरों की लहरियों के साथ<br />और मेरे सामने वृक्ष लगते सूखने, पर्ण चरमर चूर होते<br />उन मदोन्मत्त गजसमों की देह का अभिमान टूटा जा रहा एक सूती चीर सा<br />बहा करती है अब भी सरिता उन किनारों पे<br />कि जिनके सामने सदा बहना उसकी नियति है<br />और काटा कर रही उन कृष्णवर्णी पाषाण को कि<br />जिनके अन्त तक के अंग में केवल औद्धत्य है<br />भव्य मीनारें गगनचुम्बी शिखर अठखेलियां करते हुए से<br />वे बडे नत शैल ज़्यों डराते हों गगन को छातियां चौडी किये से<br />गान ऐसा गूंजता रहता उस सघन वन प्रान्त में<br />कि जिसके शब्द की पदचाप भी छू पाना असम्भव<br />और फिर भी नाद कर देता कर्ण कुहरों को व्याकुल<br />पुनर्पुन: शब्द क चमत्कार<br />वे सर्पिल सी निशब्द रेखाओं सी नदियां<br />जिनमें प्रवेशोपरान्त फिर लौटने की नही क्षमता न ही आवेग<br />वे दुस्साहसी मानव यहां आके बस गये है<br />चीर कर धरती का सीना खीन्च ही लेते है रोटी<br />उस कठोर श्रमवान दल के स्वेद बिन्दु गिरा करते हैं अब भी यहीं पे<br />कहीं अचानक मिल जायें तो कितना सुलभ हो जाये जीना<br />ज़िन्दगी की राह पे चढना उतरना फिसल आना<br />सामने कुछ भी नही अब सघन वन अन्धियार है<br />चिडिया उड गयी हैं जा बसी अपने घरों मे<br />मै क्यूं भटक रहा यूं ही चतुर्दिक्<br />यूं ही निरन्कुश निरर्गल विक्षुब्ध सा<br />कहां पर है आग जो बुझ नही पाती कभी भी<br />कहां से उस नाट्य पर परदा गिराऊं<br />कथायें बहुत्, घटना बहुत है और मेरे सामने दर्शक नही कोई खडा<br />सब चले अपने निलय को शयन की ये मध्य बेलाBhaskar Lakshakarhttp://www.blogger.com/profile/18112544818203939650noreply@blogger.com