tag:blogger.com,1999:blog-14743488.post-1122200303988287702005-07-24T04:11:00.000-06:002005-07-24T04:18:23.993-06:00पृथ्वी वैसी ही घूमती रहती है सूरज के चारों ओर निर्विकार तापस सी<br />मारीच सुखा डालता है उसके मेह से भरे केश,<br />और वो बांधती वल्कली जूडा सघन वनराशि का<br />देखते ही देखते चौरासी के परिभ्रमण से घट जाती एक और योनि<br />मगर सचमुच कहीं नहीं घटता कुछ, रन्च मात्र बदलाव भी नहीं<br />वैसी ही निजन आकाश के सिन्धु में डूबती जाती, गुजरती ज़िन्दगी<br />कथानक और बढ्ते जाते निरन्तर निर्ज़्हरों के अश्रु बिन्दु सा,<br />कुछ महीन रेशम सा गड जाता आकर के मेरी आंख मे<br />और जब मै जागता तो पाता, नही ये स्वप्न ही तो था<br />दिगन्तर तक सुलगती रह्ती रश्मियां उस सुर्य की<br />स्वयं की दावाग्नि से पीडित ह्रदय उसका और भी रक्तिम लगा है<br />और धरती से घूमते ही घूमते पाता मै अचानक<br />भर गया कौतुक उन बादलों के मध्य रंगराशि में<br />विस्मयाच्छादित कर गये वे रेशमी बादल भले ही स्वप्न से निरथक निफल थे<br />लिख गये गुन्जन कोकिला की स्वर ग्रन्थियों पर<br />डाल कर जादू सा कर दिया रेखाखचित इस विश्व को,बस देखते ही देखते<br />और अब भी गुन्जती रहती मेरी श्रवणेन्द्रियांउस व्यर्थ की निरत पदचाप से,<br />जो छोड आया मै अचानक उन बाद्लों के मोह में<br />एक्-एक कण नभि कस्तूरी का खोजता मै उछलकरा<br />और पूरा हो जाता एक चक्कर और प्रथ्वी का अन्शुमन की परिधि मे<br />शिशु की मनिन्द उझककर देखता मै बाज़ीगरी का खेल<br />मगर अब क्या? सूरज छिपने वाला है खेल खत्म हुआ/Bhaskar Lakshakarhttp://www.blogger.com/profile/18112544818203939650noreply@blogger.com