tag:blogger.com,1999:blog-147434882007-05-01T17:46:59.252-06:00संवदियाBhaskar Lakshakarhttp://www.blogger.com/profile/18112544818203939650noreply@blogger.comBlogger7125tag:blogger.com,1999:blog-14743488.post-1124646321645663542005-08-21T11:42:00.000-06:002005-08-22T06:43:40.466-06:00हे सघन जल मेघ<br />बरसो उमड कर, कोश कर दो शेष<br />रिक्तियों के अन्त तक के गर्भ मे तुमको है जाना<br />यह धरा प्यासी युगों से, लौह इसके अंग मे अब बस गया है<br />एक मरुथल की सी छवि का कोई शर आकर ह्र्दय मे धंस गया है<br />पत्तियों पर शुष्क बून्दे निर्वसन सी नाचती है<br />ज्यों कपोलो पर धरा के अश्रु से झर के गिरे थे<br />उस महोदधि से ही तो तुम लाये हो पानी<br />जिस मदोन्मत कोश को पृथ्वी ने त्यागा<br />बांध दी सीमायें उसकी, उस कथित पौरुष की<br />जिसने जकड कर रखा था युग से, कल्प से<br />और अब भी कर चुकाया कर रहा वह महासागर<br />हे पयोधर तुम उसी जलनिधि के निकटतम दूत ही तो<br />क्या सन्देशे भेजता वह मानिनी प्रथ्वी को निवेदित?<br />दिनोदिन चढता ज्वार के आने के दिन तक<br />और फिर अस्ताचल को जैसे सूर्य हो जाते पराभूत<br />वैसे ही लाघव को, पूरा स्वयम् ही करता पयोनिधि<br />देह छू उस यौवना की लौट जाता गेह मे निज चिर वियोगी<br />हे वारिवाहन आये क्या तुम फिर वही आशाओं का दीपक जलाने<br />रश्मियों को रोक कर सूरज की क्या निपट एकान्त तुमको चाहिये?<br />बूंद के आघात से करते क्या निवेदन, इस निपट भोली धरित्री से दिवसनिशि?<br />थामकर बैठा है सागर देखता सा पंथ तेरा उस समय से<br />जब कि तेरे पितृ पूर्वज जन्म भी पाये न थे/<br />और अब भी सामने उसके वही दुर्दम्य सा सागर उच्छ्रंखल<br />बद्ध जिस के उर्मिलों मे चिर प्रतीक्षा बून्द के लघुतम कणों सी<br />हे जलद तुम बरस कर कब तक कहोगे ये सन्देशे मौन के<br />कब तक लिखेगा यह वियोगी भाव मन के?<br />और पढवाती रहेगी धरा उनको अपने वृक्ष गुल्मों और त्रण से//Bhaskar Lakshakarhttp://www.blogger.com/profile/18112544818203939650noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14743488.post-1124093410213099422005-08-15T02:07:00.000-06:002005-08-15T02:10:10.213-06:00भारति जय विजय करे,<br /> कनक शस्य कमल धरे/<br />लंका पदतल शतदल, गर्जितोर्मि सागर जल<br />धोता शुचि चरण युगल, स्तव कर बहु अर्थ भरे/<br />तरु तृण वन लता वसन, अन्चल मे खचित सुमन<br />गंगा ज्योतिर्जल कण, धवल धार हार गले/<br />मुकुट शुभ्र हिम तुषार. प्राण प्रणव ओंकार<br />मुखरित दिशायें उदार, शतमुख शतरव मुखरे/<br /> <span style="color:#3333ff;"> महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला</span>"Bhaskar Lakshakarhttp://www.blogger.com/profile/18112544818203939650noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14743488.post-1124092724269277352005-08-15T01:00:00.000-06:002005-08-15T01:58:44.276-06:00<span style="font-family:lucida grande;">स्वाधीनता दिवस पर हार्दिक बधाई/</span><br /><span style="font-family:lucida grande;">सत्ता की गलियों में कीचड है पैसे का</span><br /><span style="font-family:lucida grande;">नीति की परिस्थिति वृद्धा सी डगमगाई</span><br /><span style="font-family:lucida grande;">उजडी सी गलियों को रोते से गांवों को</span><br /><span style="font-family:lucida grande;">वित्त की व्यवस्था ने जीभ सी चिढाई</span><br /><span style="font-family:lucida grande;">गोल गोल सिक्कों ने कर दिया है "रैशनल"</span><br /><span style="font-family:lucida grande;">तुमने ये देश की बात क्यूं चलाई</span><br /><span style="font-family:lucida grande;">सपनों मे यू एस ए, बातों मे राष्ट्रवाद</span><br /><span style="font-family:lucida grande;">आजकल मदारी ने ऐसी कसम खाई</span><br /><span style="font-family:lucida grande;">कागज़ों पे स्याही लीप और बोल अंग्रेज़ी</span><br /><span style="font-family:lucida grande;">हमने भी गांव में नयी हवा चलाई</span><br /><span style="font-family:lucida grande;">चाशनी में तर गलियां, नेता के आसपास </span><br /><span style="font-family:lucida grande;">इस नये धन्धे मे मलाई ही मलाई</span><br /><span style="font-family:lucida grande;">उल्टी है परिभाषा उलझे हैं राजकाज</span><br /><span style="font-family:lucida grande;"> कौन ये सोचे कैसे ये घडी आई</span><br /><span style="font-family:lucida grande;">स्वाधीनता दिवस पर हार्दिक बधाई</span>Bhaskar Lakshakarhttp://www.blogger.com/profile/18112544818203939650noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14743488.post-1122202269284219372005-07-24T04:46:00.000-06:002005-07-24T04:51:09.286-06:00धूप मेरी आंखों मे उतर आयी है,<br />और मै खडा हो गया जाकर उस अकेली बह रही धारा किनारे<br />शिरो बिन्दु तक सब आप्लावित् कर रहा मेरा ह्रदय उस शिशु सद्रश<br />सम्मुख विजय की द्रष्टियां नूतन ह्र्दय नव स्रष्टियां<br />लौकिक नही कुछ भी यहां इस सिन्धु में<br />एक दीपक जला करता है निरंतर उस मनो आलिन्द में<br />वो कूकती रहती है कोकिल स्वरों की लहरियों के साथ<br />और मेरे सामने वृक्ष लगते सूखने, पर्ण चरमर चूर होते<br />उन मदोन्मत्त गजसमों की देह का अभिमान टूटा जा रहा एक सूती चीर सा<br />बहा करती है अब भी सरिता उन किनारों पे<br />कि जिनके सामने सदा बहना उसकी नियति है<br />और काटा कर रही उन कृष्णवर्णी पाषाण को कि<br />जिनके अन्त तक के अंग में केवल औद्धत्य है<br />भव्य मीनारें गगनचुम्बी शिखर अठखेलियां करते हुए से<br />वे बडे नत शैल ज़्यों डराते हों गगन को छातियां चौडी किये से<br />गान ऐसा गूंजता रहता उस सघन वन प्रान्त में<br />कि जिसके शब्द की पदचाप भी छू पाना असम्भव<br />और फिर भी नाद कर देता कर्ण कुहरों को व्याकुल<br />पुनर्पुन: शब्द क चमत्कार<br />वे सर्पिल सी निशब्द रेखाओं सी नदियां<br />जिनमें प्रवेशोपरान्त फिर लौटने की नही क्षमता न ही आवेग<br />वे दुस्साहसी मानव यहां आके बस गये है<br />चीर कर धरती का सीना खीन्च ही लेते है रोटी<br />उस कठोर श्रमवान दल के स्वेद बिन्दु गिरा करते हैं अब भी यहीं पे<br />कहीं अचानक मिल जायें तो कितना सुलभ हो जाये जीना<br />ज़िन्दगी की राह पे चढना उतरना फिसल आना<br />सामने कुछ भी नही अब सघन वन अन्धियार है<br />चिडिया उड गयी हैं जा बसी अपने घरों मे<br />मै क्यूं भटक रहा यूं ही चतुर्दिक्<br />यूं ही निरन्कुश निरर्गल विक्षुब्ध सा<br />कहां पर है आग जो बुझ नही पाती कभी भी<br />कहां से उस नाट्य पर परदा गिराऊं<br />कथायें बहुत्, घटना बहुत है और मेरे सामने दर्शक नही कोई खडा<br />सब चले अपने निलय को शयन की ये मध्य बेलाBhaskar Lakshakarhttp://www.blogger.com/profile/18112544818203939650noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14743488.post-1122200303988287702005-07-24T04:11:00.000-06:002005-07-24T04:18:23.993-06:00पृथ्वी वैसी ही घूमती रहती है सूरज के चारों ओर निर्विकार तापस सी<br />मारीच सुखा डालता है उसके मेह से भरे केश,<br />और वो बांधती वल्कली जूडा सघन वनराशि का<br />देखते ही देखते चौरासी के परिभ्रमण से घट जाती एक और योनि<br />मगर सचमुच कहीं नहीं घटता कुछ, रन्च मात्र बदलाव भी नहीं<br />वैसी ही निजन आकाश के सिन्धु में डूबती जाती, गुजरती ज़िन्दगी<br />कथानक और बढ्ते जाते निरन्तर निर्ज़्हरों के अश्रु बिन्दु सा,<br />कुछ महीन रेशम सा गड जाता आकर के मेरी आंख मे<br />और जब मै जागता तो पाता, नही ये स्वप्न ही तो था<br />दिगन्तर तक सुलगती रह्ती रश्मियां उस सुर्य की<br />स्वयं की दावाग्नि से पीडित ह्रदय उसका और भी रक्तिम लगा है<br />और धरती से घूमते ही घूमते पाता मै अचानक<br />भर गया कौतुक उन बादलों के मध्य रंगराशि में<br />विस्मयाच्छादित कर गये वे रेशमी बादल भले ही स्वप्न से निरथक निफल थे<br />लिख गये गुन्जन कोकिला की स्वर ग्रन्थियों पर<br />डाल कर जादू सा कर दिया रेखाखचित इस विश्व को,बस देखते ही देखते<br />और अब भी गुन्जती रहती मेरी श्रवणेन्द्रियांउस व्यर्थ की निरत पदचाप से,<br />जो छोड आया मै अचानक उन बाद्लों के मोह में<br />एक्-एक कण नभि कस्तूरी का खोजता मै उछलकरा<br />और पूरा हो जाता एक चक्कर और प्रथ्वी का अन्शुमन की परिधि मे<br />शिशु की मनिन्द उझककर देखता मै बाज़ीगरी का खेल<br />मगर अब क्या? सूरज छिपने वाला है खेल खत्म हुआ/Bhaskar Lakshakarhttp://www.blogger.com/profile/18112544818203939650noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14743488.post-1122102732126716842005-07-23T01:01:00.000-06:002005-07-23T01:12:12.130-06:00उन्मेषआज प्रथम दिवस है हिन्दी परिपत्र लिखने का.आलस्यं हि मनुष्याणाम शरीरस्थो महारिपु: अतएव आज द्रढता पूर्वक बैठ ही गया/ आशा ऐसी है कि निरन्तरता रहेगी,शेष भविष्य के गर्भ मे है/Bhaskar Lakshakarhttp://www.blogger.com/profile/18112544818203939650noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14743488.post-1122101976459120872005-07-23T00:42:00.000-06:002005-07-23T00:59:36.463-06:00kआइने मे दिखता है सब कुछ उल्टा<br />दायें से बायां और बायें से दायां हो जाता हे सब कुछ<br />देखते रह्ते हैं ता-उम्र खुद को और दूसरों को आइने में<br />और हो जाते हैं अभ्यस्त खुद को वैसा ही समझने के, सदा के लिये/Bhaskar Lakshakarhttp://www.blogger.com/profile/18112544818203939650noreply@blogger.com